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विरुद्ध आहार स्वास्थ्य पर वार

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि रात किसी पार्टी में गए और अगले सुबह उठे तो पेट बहुत भारी-भारी होता है। खट्टी डकारें, सीने में जलन और उसके बाद उल्टियों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह सिलसिला यहां ही नहीं रुकता है। सिरदर्द, चक्कर और न जाने क्या-क्या होने लगता है। कुछ तो डाक्टर की क्लीनिक पर दो-तीन दिन चक्कर लगाकर ठीक हो जाते हैं लेकिन ज्यादातर लंबे समय तक दवा खाते हैं या लंबी समयावधि तक किसी रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि पार्टियों में परोसे जाने वाले व्यंजन विभिन्न प्रकार के होते हैं। इनमें दूध, दही, खमीर, तैलीय, विभिन्न दालों व सब्जियों से बने व्यंजनों के साथ-साथ फल, शीतल पेय, कॉफी, चाय आदि तो होते ही हैं, कहीं-कहीं तो मांसाहार भी होते हैं। आजकल तो चाउमिन, पिज्जा, दक्षिण भारतीय व्यंजन तथा सलाद आदि भी भोजन की सूची में शामिल होते हैं। पार्टियों में मिठाइयों के साथ-साथ आइसक्रीम का भी चलन है। अब होता यह है कि इतनी वैरायटी को देखकर मन यह करता है कि प्रत्येक को चखा जाए। बस यहीं से शुरू होता है विरुद्ध आहार का वार । न केवल पार्टियों में घर में भी इस प्रकार के विरुद्ध आहार से कई रोगों के शिकार हो जाते हैं।

क्या होता है विरुद्ध आहार

जब हम दो विपरीत प्रकृति वाले भोज्य पदार्थों का सेवन कर लेते हैं और बीमार पड़ जाते हैं तो इस आहार को विरुद्ध आहार कहा जाता है। अर्थात् विरोधी तासीर वाली चीजों को खाने से जो दुष्परिणाम होता है उसे विरुद्ध आहार की श्रेणी में माना जाता है। आयुर्वेद में आहार को चिकित्सा का अंग माना गया है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि रोगी पथ्य व अपथ्य का ध्यान रखे। रोग के अनुसार ही आहार ग्रहण करना आयुर्वेद की पहली शर्त है। चरक सूत्र में विरोधी आहार की परिभाषा इस प्रकार दी है कि जो आहार द्रव्य या औषधि दोषों को अपने स्थान से उभार दे लेकिन शरीर से बाहर न निकाले वे सभी आहार-द्रव्य अहितकर अर्थात् विरोधी होते हैं। चरक सूत्र में यह भी कहा गया है कि देह की धातुओं के विपरीत गुण वाले जो द्रव्य शरीर की धातुओं के विरुद्ध होते हैं, उन्हें विरोधी आहार कहा जाता है। ऐसा भी होता है कि सब प्रकार से रुचिकर दिखने वाला भोजन शरीर के स्वास्थ्य को हानि पहुंचा कर रोगी बना देता है। इसका कारण है-आहार अर्थात् भोजन में नौ प्रकार के गुणों का समंवय न होना। ये नौ गुण इस प्रकार हैं-वर्ण, प्रसाद, सुखम, संतुष्टि, सौस्वरयम, पुष्टि, प्रतिभा, मेध और बल। हमारे आहार में इन नौ गुणों का समन्वय, सामंजस्य और पूर्ति होने से संतुलित आहार कहलाता है। यह खाने में अच्छा लगने वाला, पचने वाला और पुष्टिवर्धक होता है। आयुर्वेद के अनुसार कभी भी दो विरुद्ध प्रकृति वाली भोज्य वस्तुओं को एक साथ नहीं खाना चाहिए। जो खाद्य पदार्थ रस- रक्तादि धातुओं के विरुद्ध गुण-धर्म वाले व वात-पित्त-कफ इन त्रिदोषों को पैदा करने वाले हैं तो इनके सेवन से रोगों की उत्पत्ति होती है। चरक सूत्र, वाग्भट की अष्टांगहृदयम्, अष्टांगसंग्रह तथा भावप्रकाश निघण्टु में विरुद्ध आहार के प्रकार बताए हैं।

विरुद्ध आहार के प्रकार

देश विरुद्ध : किसी भी देश अथवा स्थान की जलवायु के अनुसार भोजन करना चाहिए। शुष्क प्रदेश में सूखे या तीखे अर्थात अधिक मसालेयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी दलदली भूमि वाले प्रदेश या स्थान में चिकनाई वाला भोजन नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करते हैं तो यह विरुद्ध आहार कहा जाएगा।

काल विरुद्ध : कालानुसार ही भोजन करना चाहिए। सर्दियों में सूखी और ठंडी भोज्य वस्तुएं नहीं खानी चाहिए और गर्मियों के समय तीखी व कशाय भोजन नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करते हैं तो यह विरुद्ध आहार कहलाएगा।

अग्नि विरुद्ध : जठराग्नि के अनुसार यदि आहार न मिले तो इसे अग्नि विरुद्ध कहा जाता है। उदाहरणार्थ यदि जठराग्नि मध्यम है और व्यक्ति गरिष्ठ भोजन करे तो इसे अग्नि विरुद्ध कहा जाएगा।

मात्रा विरुद्ध : उचित मात्रा में नहीं लिया गया आहार विरुद्ध कहा जाएगा। इस प्रकार कि जैसे शहद और घी बराबर मात्रा में मिलाकर खाया जाए तो यह विरुद्ध आहार है।

सात्म्य विरुद्ध : जिसको जैसे आहार की प्रवृत्ति हो गई है, उसे वैसा ही भोजन अनुकूल होगा। यदि नमकीन भोजन खाने वाले की प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को मीठा व रसीला भोजन करना पड़े तो यह विरुद्ध आहार है।

दोष विरुद्ध : जो आहार व्यक्ति के त्रिदोष अर्थात् वात-पित-कफ को बढ़ाने वाला होवह दोष विरुद्ध आहार कहलाता है।

संस्कार विरुद्ध : अनुचित ढंग से पकाया गया भोजन संस्कार विरुद्ध कहलाता है। उदाहरण के तौर पर यदि दही व शहद को गर्म कर लिया जाए तो ये जहरीले हो जाते हैं।

कोष्ठ विरुद्ध : जिस व्यक्ति की कोष्ठबद्धता की स्थिति हो उसे थोड़ी मात्रा व कम मल बनाने वाला भोजन देना और शिथिल गुदा वाले व्यक्ति को अति गरिष्ठ और ज्यादा मल बनाने वाला भोजन देना कोष्ठ विरुद्ध आहार कहलाता है।

वीर्य विरुद्ध : गर्म तासीर वाली भोजन सामग्री को ठंडी तासीर वाली भोजन सामग्री के साथ खाना वीर्य विरुद्ध कहलाता है।

अवस्था विरुद्ध : शारीरिक अवस्था के अनुरूप आहार नहीं करना अवस्था विरुद्ध कहलाता है। कोई व्यक्ति जो परिश्रम, व्यायाम या मैथुन के कारण थका हुआ है और वातवर्धक आहार करता है या जो अधिक सोता है और आलसी है और कफवर्धक आहार लेता है तो यह अवस्था विरुद्ध आहार है।

क्रम विरुद्ध : यदि कोई व्यक्ति मल-मूत्र का बिना त्याग किए हुए भोजन करता है, जब भूख न लगी हो तब करता है अथवा भूख मर जाने पर करता है तो उसे क्रम विरुद्ध आहार कहते हैं।

परिहार विरुद्ध : वैद्य व चिकित्सक के द्वारा निषेध की हुई भोज्य वस्तुओं को जब कोई व्यक्ति सेवन करता है तो इसे परिहार विरुद्ध कहा जाएगा। उदाहणार्थ जब किसी व्यक्ति को दूध नहीं पचे और वह फिर भी उसका सेवन करे तो यह परिहार विरुद्ध हैं।

उपचार विरुद्ध : किसी विशिष्ट उपचार विधि में नहीं खाने योग्य वस्तु को खाना उपचार विरुद्ध कहलाता है। जैसे घी का सेवन करने के बाद ठंडी चीजों का सेवन अथवा पानी पीना। पाक विरुद्ध : दूषित ईंधन से पकाई गई अधपकी, अधिक पकी या जली हुई भोज्य सामग्री का सेवन पाक विरुद्ध कहलाता ।

संयोग विरुद्ध : दूध के साथ अम्लीय पदार्थों का सेवन संयोग विरुद्ध है।

हृदय विरुद्ध : मनोनुकूल आहार ही पाचक होता है क्योंकि आहार के पचने में मन की भूमिका होती है। अतः जो भोजन मनोनुकूल और रुचिकर न हो, वह हृदय विरुद्ध होता है।

सम्पद विरुद्ध : आजकल शुद्धिकरण अर्थात् रिफाइनिंग को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। इस प्रक्रिया में प्रायः भोजन के पौषक गुण निकल जाते है और उस भोजन की पोषकता भी समाप्त हो जाती है। यदि अधिक विशुद्ध भोजन किया जाए तो इसे सम्पद विरुद्ध कहा जाता है।

विधि विरुद्ध : एकान्त में ही भोजन करना चाहिए अतः जो भोजन सार्वजनिक स्थान पर ग्रहण किया जाता है वह विधि विरुद्ध होता है।

विरुद्ध आहार के उदाहरण : दूध हमारे लिए एक ऐसा आहार है जिसमें सबसे अधिक पोषक व शरीर को शक्ति देने वाले तत्व विटामिन व प्रोटीन, वसा आदि होते हैं। दूध को एक संपूर्ण आहार माना जाता है लेकिन इसके साथ भी अन्य अनुचित भोज्य पदार्थ लेने पर यह विरुद्ध आहार की श्रेणी में आ जाता है। दूध के साथ कुछ भोज्य वस्तुओं को खाने से हमें बचना चाहिए।

दूध और नमक (सेंधा नमक छोड़कर) एक साथ प्रयोग नहीं करना चाहिए। सभी प्रकार की खटाइयां, मछली, मूंगफली, कटहल, कुलत्थी को दूध साथ प्रयोग नहीं करना चाहिए। शहद और घी को समान मात्रा में मिलाकर प्रयोग करने से विष के समान हो जाता है। शहद को गर्म करके कभी न खाएं। दही को गर्म करने से भी विपरीत परिणाम निकलते हैं। केवल कढ़ी बनाकर खाया जा सकता है। रात्रि में दही का सेवन निषेध है। लेकिन भोजन के बाद छाछ लेना लाभदायक है। रात्रि में भोजन के बाद दूध लेना लाभदायक है। कफ और वात की प्रबलता होने पर दही का प्रयोग न करें।

दूध के साथ सलाद का सेवन निषेध है। विशेषतः केले के साथ दूध न लें क्योंकि केला कफवर्धक है और दूध भी । दोनों को एक साथ ग्रहण करने से कफ तो बढ़ता ही है, पाचन क्रिया पर भी बुरा असर होता है। दूध और दही को एक साथ नहीं लेना चाहिए क्योंकि दोनों की तासीर अलग है। इससे एसिडिटी बढ़ती है और अपच के कारण उल्टी भी हो सकती है। दूध के साथ संतरे का जूस लेने से भी पेट में खमीर बनता है। यदि ऐसा करना भी है तो कम से एक घंटे का अंतर होना चाहिए। भोजन के साथ चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक नहीं लेनी चाहिए और खाने के तुरंत बाद ठंडा पानी भी नहीं पीना चाहिए। पानी पीने से खाना बिना पचे ही पेट में चला जाएगा अतः पीना ही है तो थोड़ा गर्म या गुनगुना पानी पीएं। हमेशा बहुत ठंडा पानी ग्रहण करने से बचें। पानी को अजवायन या जीरा उबालकर पीएं तो लाभकारी होता है और पाचनक्रिया में मदद करता है।

भोजन करने से आधा घंटा पहले या भोजन के एक घंटे बाद पानी पीना ठीक होता है। भोजन के तुरंत बाद चाय पीना भी निषेध है। ऐसा करने से शरीर में आयरन की कमी आ जाती है। सलाद को मुख्य भोजन से पहले खाना चाहिए, बाद में नहीं। मुख्य भोजन के बाद सलाद खाने से पाचन क्रिया में रुकावट आती है क्योंकि सलाद भारी होती है और आसानी से पचती नहीं है। इस कारण उदर में गैस तथा एसिडिटी बनने लगती है। उड़द की दाल के साथ दही का प्रयोग नहीं करना चाहिए। वास्तव में दही-वड़ा भी विरुद्ध आहार की सूची में आता है और इसका चलन बहुत अधिक है। वड़ा यदि मूंग की दाल से बना हो तो अच्छा रहता है। इसके अतिरिक्त भी कुछ नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो विरुद्ध आहार के दोष आ जाते हैं-जौ के आटे का सेवन किसी अन्य अन्न को मिलाकर करना चाहिए। जौ का आटा विशुद्ध रूप से सेवन करने पर विरुद्ध आहार का दोष प्रदान करता है।

सत्तू को पानी मिलाकर ही सेवन करें और रात्रि के समय सत्तू का सेवन निषेध है।

पान का प्रयोग इन अवस्थाओं में निषेध है-शौच क्रिया के बाद, भोजन से पहले, सर्दी-जुकाम होने पर, पसीना आने पर तथा दांतों में पीव आने पर।

गेहूं को तिल के तेल में पकाना नहीं चाहिए नहीं तो विरुद्ध आहार कहलाता है।

दही, शहद व मदिरा ग्रहण करने के बाद गर्म पदार्थों का सेवन विरुद्ध आहार है। केले के साथ दही या लस्सी पीना विरुद्ध आहार है। तांबे के बर्तन में रखा हुआ घी खाना- विरुद्ध आहार है। मछली व मूली के साथ गुड़ का सेवन विरुद्ध आहार है। तिल के साथ कांजी का सेवन करना विरुद्ध आहार है।

प्याज और दूध एक साथ न खाएं क्योंकि ये दोनों एक दूसरे के प्रबल विरोधी हैं। इनको एक साथ खाने से दाद, खाज, खुजली, एक्जिमा, सोरायसिस जैसे चर्म रोग पैदा हो जाते हैं।

दूध के साथ गाजर, शकरकंद, आलू, मूली, तेल, गुड़, शहद, दही, नारियल, लहसुन, कमलनाल व सभी नमकयुक्त अम्लीय पदार्थ खाना, संयोग विरुद्ध आहार कहलाते हैं।

प्याज और दूध एक साथ न खाएं क्योंकि ये दोनों एक दूसरे के प्रबल विरोधी हैं। इनको एक साथ खाने से दाद, खाज, खुजली, एक्जिमा, सोरायसिस जैसे चर्म रोग पैदा हो जाते हैं।

दूध के साथ गाजर, शकरकंद, आलू, मूली, तेल, गुड़, शहद, दही, नारियल, लहसुन, कमलनाल व सभी नमकयुक्त अम्लीय पदार्थ खाना, संयोग विरुद्ध आहार कहलाते हैं।

शहद के साथ गुड़ और घी के साथ तेल नहीं खाना चाहिए। दूध से बनाए गए छैना, पनीर व खमीर वाले पदार्थ जैसे डोसा, इडली, खमण आदि स्वभाव से ही विरुद्ध है अतः इनके सेवन से लाभ की जगह हानि ही होती है। इनके सेवन से बचना चाहिए क्योंकि इनसे लाभ कम और हानि अधिक होती है।

खीर के साथ नमक वाला भोजन तथा खिचड़ी के साथ आइसक्रीम और मिल्कशेक विरुद्ध आहार की श्रेणी में आता है। दूध में सोडा या कोल्डड्रिंक डालकर पीना विरुद्ध आहार है।

विरुद्ध आहार का सेवन बल, बुद्धि, आयु व वीर्य का नाश करता है। इसके दुष्प्रभावों से नपुंसकता, अंधापन, मनोरोग, गुदारोग, त्वचा रोग, उदर रोग, बवासीर, अम्लपित्त (एसिडिटी)

ज्ञानेन्द्रियों में विकार व आठ प्रकार के असाध्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यहां तक कि विरुद्ध आहार का सेवन मनुष्य की मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

-प्रभु कृपा पत्रिका, अप्रैल 2019

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