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आधुनिक विज्ञान की सीमा

आधुनिक विज्ञान मनुष्य के कृत्रिम अंग प्रत्यारोपित करने में सक्षम है। हार्ट में पेसर लगा देते हैं, कान में सुनने के लिए मशीन, आंख का आपरेशन कर लैंस लगा देते हैं, किडनी व लीवर भी ट्रांसप्लांट कर देते हैं लेकिन वे डीएनए नहीं बना पाए। टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा कर सकते हैं लेकिन बच्चा नहीं बना पाए। यह आधुनिक विज्ञान डीएनए नहीं बना पाया। वीर्य की एक बूंद से 90 हजार बच्चे पैदा हो सकते हैं और जो स्त्री के गर्भाशय में प्रवेश करता है वह केवल सुई की नोक से भी सूक्ष्म होता है। वैज्ञानिक केवल इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन तक ही पहुंच पाए हैं। इन्होंने समझा कि हमने इस ब्रह्मांड का रहस्य पा लिया है, अब हमें कोई जरूरत नहीं है परमात्मा की। सृष्टि जो चल रही है, उसका एक सिस्टम है और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हैरत तो यह है कि ये वैज्ञानिक मानते हैं कि हम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन बना नहीं सकते इसलिए ये कहने लगे कि गॉड पार्टिकल्स ही यह कार्य करते हैं। जब इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन स्वत: ही गतिमान है तो वे गॉड पार्टिकल्स की बात क्यों करने लगे? इतना ही नहीं गॉड पार्टिकल्स को ढूंढ़ने के लिए दो बड़े प्रयोग भी किए गए जिसमें सारी दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक शामिल हुए लेकिन असफल रहे। जब ये लोग गॉड अथवा परमात्मा को ही नहीं मानते तो गॉड के पार्टिकल्स कहां से आए। इसके बाद इनका यह भी कहना है कि यदि हमें गॉड पार्टिकल्स मिल जाएं तो हम पृथ्वी, चन्द्रमा व तारे भी बना सकते हैं। ढूंढ रहे हैं और ढूंढते ही रहेंगे लेकिन इन्हें कभी नहीं मिल सकता इनका मनचाहा। न मिला है, न मिलेगा, कभी अंधेरे को सूरज मिला है। इस जगत् में जो भी है वह बिना कारण के नहीं है। हम कौन हैं, यहां क्यों हैं और यहां कैसे आए इसका भी कारण है-जो किसी को नहीं पता और न ही कोई इस बारे में विचार ही करता है। आदमी के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। जो उसे दिखाई देता है उसे ही मानने लगता है। आदमी यह मानने लगता है कि जब हम बच्चा पैदा कर सकते हैं तो इसमें भगवान की क्या भूमिका है? जो कुछ भी है विज्ञान है। जो यंत्रों द्वारा दिखाई देता है वही सत्य है। परमात्मा इन्हें दिखाई नहीं देता इसलिए वह है ही नहीं। (लुधियाना समागम)

-प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी 2019

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