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शुद्ध धन की दिव्यता

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आमतौर पर यह देखने में आता है कि जो व्यक्ति धनी नहीं है, वह अधिक सात्विक रहता है, उसकी भावना अधिक निर्मल होती है। लेकिन जब व्यक्ति धनी हो जाता है तो उसकी प्रवृत्ति बदल जाती है तो वह धन लाभकारी अथवा प्रभु कृपा का अंश कैसे हुआ?

परम पूज्य गुरुदेव : भगवान राम कोई कम धनी नहीं थे। राजा जनक, दशरथ तथा हरिश्चन्द्र कोई कम धनी नहीं थे। परंतु इनके मन में अहंकार नहीं था। आज भी ऐसे व्यक्ति हैं जो कम धनी नहीं हैं परंतु उनके अंदर धनी होने का घमंड नहीं है। जिन्हें धन आने के बाद अहंकार होता है उसकी स्थिति धन आने से नहीं होती है। अगर वह गरीब भी होगा, तब भी उसकी स्थिति ऐसी ही होगी। धन तो उस अवस्था को प्रकट करता है। अगर सच्चा मित्र है तो वह गरीबी में भी साथ देता है, अगर पतिव्रता पत्नी है तो वह हर अवस्था में साथ रहती है। जो व्यक्ति धन आने के बाद बदल जाते हैं। मूलतः उनकी स्थिति शुरू से ऐसी ही होती है। जो व्यक्ति मां महालक्ष्मी के मंत्रों का जाप करता रहता है तो ऐसे व्यक्ति के पास हमेशा धन रहता है, ऐसा संतों, ऋषि-मुनियों द्वारा प्रमाणित माना गया है। जिस पर मां लक्ष्मी की कृपा होती है उस पर कोई कष्ट नहीं आते, कोई विघ्न नहीं आते। जिस पर मां सरस्वती की कृपा होती है, वह कलाकार होता है। उसकी वाणी में मां सरस्वती विराजती हैं। ऐसे लोग संगीत के क्षेत्र में उन्नति कर रहे हैं।

जिन्हें आज प्रतिष्ठित पदों पर आसीन या साधन संपन्न देख रहे हैं, ऐसे व्यक्तियों ने पूर्व जन्म में अवश्य ही साधन व तप किया है। जो व्यक्ति साधनहीन व निर्धन हैं, प्रभु कृपा से उनके लिए ये मंत्र अत्यन्त लाभकारी हैं।

सबसे पहले सद्गुरु को नमस्कार करें क्योंकि सद्गुरु की कृपा के बिना देवी-देवता भी प्रसन्न नहीं होते। सद्गुरु या अपने इष्टदेव का ग्यारह बार ध्यान करें उसके बाद गणपति स्त्रोत, संकट मोचन गणपति श्लोक और गणपति कवच का उच्चारण करें। इन तीनों का उच्चारण ग्यारह बार करके बीज मंत्रों का पाठ करें। चालीस दिन में ही आप यह देखकर हैरान हो जाएंगे कि इन विधियों से आपके सारे कष्ट दूर हो गये हैं। अगर किसी ने किसी गुरु से मंत्र नहीं ले रखा है या कोई गुरु धारण नहीं किया है तो मन से भगवान शिव को अपना गुरु मान लें, क्योंकि भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा सर्व व्यापक और सर्वकालिक हैं। ऐसा कोई भी समय नहीं रहा है जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव और गणपति आदि देव नहीं थे या नहीं रहेंगे। सदैव रहे हैं, आगे भी रहेंगे।

मां सरस्वती, मां लक्ष्मी सबकी हर प्रकार रक्षा करती हैं चाहे वह हिन्दू मुसलमान, ईसाई या किसी धर्म का मानने वाला हो। सभी देवी-देवता हर जाति धर्म के लिए समान रूप से कृपा करते हैं। जैसे सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी किसी जाति या धर्म विशेष के लिए विशेष कृपा (कार्य) नहीं करते बल्कि सबके लिए करते हैं। उसी प्रकार देवी-देवता भी कोई भेदभाव नहीं करते।

साधन संपन्न होने पर भी हमें इस उपाय को (पूजा-पाठ को) नहीं छोड़ना चाहिए। जिस तरह हमारे माता-पिता हमें पैदा करते हैं। वह सतगुरु जो हमें प्रेरणा देता है तो हम ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी सत्गुरु या माता-पिता को नहीं भूलते, उसी प्रकार ये देवी-देवता हैं जब ये हमें संतुष्ट करते हैं तो इन्हें भूल नहीं जाना चाहिए अर्थात पूजा-अर्चना करते रहना चाहिए। वास्तव में कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जब वे साधन संपन्न हो जाते हैं तो सोचते हैं कि यह सब मैंने अपने बाहुबल से किया है, अपनी विद्या से किया है लेकिन उसमें उनके माता-पिता का तप-त्याग शामिल है। इसलिए इसमें जो माता-पिता का त्याग है, गुरु की कृपा है, देवी-देवताओं का आशीर्वाद है उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। ऐसा करने वाले को जीवन में कभी कष्ट नहीं होता तथा सभी देवताओं की कृपा बनी रहती है।

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