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मोक्ष कैसे पाएं ?

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मोक्ष क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? कृपया इस जिज्ञासा का निवारण कीजिए।

परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति उत्तम प्रश्न किया है। हर मानव चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय से संबंधित है, इसी प्रश्न को लेकर ध्यान, साधना तथा योग द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयासरत है। हमारे धर्म ग्रंथ भी मानव जीवन का उद्देश्य मोक्ष ही मानते हैं। जिसको प्राप्त करने हेतु व्यथित मानव सद्गुरु की शरण में जाता है। मोक्ष का अर्थ बन्धन मुक्त हो जाना ही है। इसे एक उदाहरण से समझें। जैसे किसी के रोगी होने पर चिकित्सक रोगी को स्वास्थ्य कहीं से बाहर से लाकर नहीं देता है, उसे रोग से मुक्ति दिला देता है तो स्वस्थ तो वह रोगी स्वयं ही हो जाता है। ऐसे ही मानव की उत्पत्ति पांच विकारों यानी काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से हुई है। काम यानी वासना सृष्टि की उत्पत्ति का मूल है। आधुनिक विज्ञान इन पांच भावों को रोग या विकार नहीं मानता। वह इन्हें स्वाभाविक क्रिया ही मानता है, लेकिन सनातन तथा प्राचीन धर्मशास्त्रों ने इन्हें विकारों की ही संज्ञा दी है। जैसे वात, कफ, पित्त जो कि स्वाभाविक शरीर क्रिया के लक्षण समूह हैं, को दूषित करते हैं और समावस्था तो शरीर व मन से पार जाने में ही है। यही आध्यात्मिक अवस्था है।

जब मानव किसी तत्त्ववेत्ता, ब्रह्मर्षि, सद्गुरु की शरण में जाकर इन पांच महाविकारों से मुक्ति प्राप्त करता है तो मोक्ष को पा जाता है और उस शख्स का पुनर्जन्म नहीं होता। वह आवागमन के चक्करों से छुटकारा पा जाता है। निर्वाण पद का अधिकारी होकर परमपद पाकर प्रभु परमात्मा से अंगीकार हो जाता हैं स्वेच्छा से वह नया जन्म या अवतार भी धारण कर सकता है। जीवन है तो विकार भी है, लेकिन जीवन रहते हुए भी विकारों से रहित, सात्विक, कर्तव्यनिष्ठ, कर्मयोगी का आदर्श जीवन जिया जा सकता है और यही जीते जी मोक्ष प्राप्त करना है।

भगवान बुद्ध कहते हैं कि जन्म का मूल कारण इच्छा है एवं इच्छा ही दुःख है। कामना, चाहना ही इच्छा का मूल कारण है चाहे वह इच्छा प्रभु पाने की ही क्यों न हो। इच्छा से पार चले जाना स्वयं से साक्षात्कार हो जाना है, बुद्धत्व हासिल करना है। वही परम स्थिति है। मोक्ष की अनुभूति है। भगवान महावीर भी कहते हैं कि यह जन्म ही पाप है। मरण भी पाप है जवानी को भी, बचपन को भी रोग कहा गया है। शरीर की सारी अवस्थाएं ही दुःखस्वरूप हैं। पर जो मानव इस शरीर के बन्धनों से परे मूल तत्व को पहचान लेता है वही ‘अमर’ हो जाता है। मुक्त हो जाता है।

किसी तत्त्ववेत्ता से परम गूढ़ रहस्यमी दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद मानव मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। यह तभी संभव है जब कोई ज्ञान पिपासु पपीहे की तरह व्याकुल होकर, स्वाति की बूंद की सी प्रतीक्षा व धैर्य संजोए जब किसी तत्त्वदर्शी के सममुख श्रद्धा से नतमस्तक होता है, पूर्ण समर्पण भाव से दण्डवत करता है, स्व अस्तित्व भूल जाता है, तभी वह विराट स्वरूप देखने का सुपात्र बनता है।

मोक्ष का एक अन्य अर्थ है- वह शख्स जो मन का गुलाम नहीं है, वासनाओं का गुलाम नहीं है। बल्कि काम, क्रोध, लोभ और अहंकार अब उसके गुलाम हो गए हैं। उसके द्वारा नियंत्रित हैं। ये जंगली हिंसक जानवर प्रतीक महाविकार, उस मानव के समक्ष पालतू बिल्लियों की भाँति बन जाते हैं। योगी लोग अपनी इच्छा से ही क्रोधित होते हैं। जब मदमस्त विषधर की तरह यह विकार मानव या देवों को पथच्युत करने की कोशिश करते हैं, दुस्साहस करते हैं तो उनका हश्र भी वहीं होता है जो कि कामदेव का शंकर जी को उकसाने की कोशिश में हुआ था। भस्म हो जाते हैं काम, क्रोध, इत्यादि । कामाग्नि, दिव्याग्नि की भेंट चढ़ जाती है।

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मोक्ष प्राप्त करने के बाद मानव जाता कहां है? क्या होता है निर्वाण प्राप्ति के बाद?

परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति महत्वपूर्ण प्रश्न किया है। इस बाबत एक जगह सद्गुरु श्री नानकदेव जी ने लिखा है- “ज्यों जल में जल आए खटाना, त्यों ज्योति संग जोत समाना।

अर्थात् जैसे सागर की लहर सागर में खोकर अपनी पहचान छोड़ जाती है। बूंद स्वयं सागर बन जाती है। वैसे ही बूंद जीवात्मा भी परमात्मा के विशाल सागर में विलीन हो जाती है।

महात्मा बुद्ध कहते हैं कि दीपक के बुझ जाने का नाम मोक्ष है। वैसे ही शरीर समाप्त होने पर भौतिक शरीर तो पंचतत्त्वों में विलीन हो जाता है और आत्मा परमात्मा में बशते मानव ने अपने जीवन काल में अपने स्वयं से साक्षात्कार कर लिया हो। समर्पण भाव से सद्गुरु से दीक्षा ले ली हो एवं सद्कर्मा व भक्तिमार्ग से अपने संचित कर्मों को भस्मीभूत कर दिया हो। यही मानव। जीवन की परमश्रेष्ठ अवस्था है।

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अब जिज्ञासा यह उठती है कि मानव जीवन का ध्येय अगर मोक्ष प्राप्त करना है तो जीते जी मोक्ष प्राप्त करने के बाद शरीर की क्या उपयोगिता रह जाती है ?

परम पूज्य गुरुदेव : एक रोगी जो औषधि खा रहा है अथवा हास्पिटल में एडमिट है, उसके स्वस्थ होने के बाद हास्पिटल का क्या महत्व रह जाता है? इलाज करने वाले चिकित्सक की क्या अहमियत रह जाती है? मान लो कोई पैदा ही हास्पिटल में हुआ हो और उसका पूरा जीवन ही अस्पताल में बीता हो और कोई उसे बलात् हास्पिटल से जाने के लिये कहे तो वह पीड़ा तो महसूस करेगा ही पर कोई यथार्थवादी ही जानता है कि वह अस्पताल कोई घर नहीं है-एक किराए का मकान है, धर्मशाला है, सराय है, रैन बसेरा हैं। यह जगत तो ट्रेनों का एक जंक्शन है कोई ट्रेन आती है तो कोई जाती है। पर योगियों के लिये, मनीषियों के लिए यह संसार ऐसे हो गया है जैसे रोगी के लिए दवा, डाक्टर या हास्पिटल। जब उन्होंने उस परमानन्द का रसास्वादन करके जगत को भोगा तो उन्हें जगत न अच्छा लगा न बुरा। जैसे आप किसी मार्ग से जा रहे हैं तो साइडों पर पड़े कूड़ेदानों या नालियों से घृणा नहीं करते। आप अपने रास्ते से निकल जाते हैं। ऐसे ही यह संसार नाली की तरह है।

यात्रा पूरी करने के बाद ट्रेन हमारे लिये महत्वहीन हो जाती है एवं अपने घर जाकर हम शांत हो जाते हैं, खुशी में किलकारियां मारते हैं। ऐसे ही यह शरीर अपने घर पहुंचने के लिए एक ट्रेन है। सद्गुरु एक टिकट का प्रतीक है। पर अच्छे कर्म व अनुशासन जरूरी है वर्ना बिना यात्रा पूरी किये आपको अन्य योनियों में भटकना पड़ सकता है।

यह शरीर भोग या वासनाओं के लिए नहीं मिला है। न ही कभी किसी की वासनाओं से तृप्ति हुई है। ये इन्द्रीय सुख अनुभूतियां तो सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जाती हैं। आहुति पे आहुति लिए जाती हैं। लेकिन स्वयं पर अंकुश लगाकर इसी देह में रहकर ही मुक्ति का मार्ग खोजा जा सकता है। मर्यादित भोग करते हुए भी योग की प्राप्ति की जाती है। यही इस देह की उपयोगिता है। ज्ञानियों के लिए यह शरीर या जगत मैले कपड़े को त्यागने के बराबर हो जाता है।

इस जगत् में आप अगर भ्रमण करेंगे तो पाएंगे कि हर आदमी सिर्फ एक ही चीज को खोज रहे हैं। वह है काम, भोग, वासना, धन, यश, वैभव। इस जगत् में कोई भी मानव ऐसा नहीं है जिसकी कामना नहीं है। जब कभी कोई मानव परमात्मा की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति का साधन पूछता है तो इसका अर्थ है कि उसने पूरे जगत को देख लिया है। क्योंकि परमात्मा की प्राप्ति का जो मार्ग है, साधारण आदमी उस मार्ग पर नहीं चल सकता है। सिर्फ श्रेष्ठ आदमी ही परमात्मा की कामना कर सकता है।

आजकल हर आदमी वास्तव में जो कुछ कर रहा है, अगर वह विद्या भी ग्रहण कर रहा है या राजा भी बनना चाह रहा है तो उसके अंतर्मन में एक ही कामना है कि वह कैसे सुख को प्राप्त करें, कैसे आनंद को प्राप्त करें। मानव सोचता है कि मैं राष्ट्रपति बनकर आनंद को प्राप्त करूंगा, सुख को प्राप्त करूंगा लेकिन जैसे कोई व्यक्ति राजा बनता है या उच्च पदों पर जाता है तो उसे ऐसा लगता है कि यहाँ तो दुःखों का अंबार लगा हुआ है और कई बार मानव को सब कुछ बनने के बाद भी दुःख का अनुभव नहीं होता। यह किसी-किसी बुद्ध को, महावीर को, किसी सद्गुरु नानक को, किसी कबीर को, किसी रविदास को, किसी मीरा को, किसी दत्तात्रेय को अर्थात् ऐसे मनीषियों के अंदर यह कामना आती है कि यह जगत् नश्वर है, यहाँ जो भी नजर आता है, जीवन में कोई महत्व नहीं है। अगर इस तरह की कोई कामना रखता है तो यह स्पष्ट है कि उसका प्रभु से बहुत अधिक सान्निध्य रहा है। अन्यथा परमात्मा की प्राप्ति की कामना इस जगत् में किसी की नहीं होती है। इस जगत् में सभी काम के पीछे भाग रहे हैं। ऐसे व्यक्ति को जीवन में कुछ नहीं मिलता है। सिर्फ कुछ ही क्षणों में तत्ववेत्ता संत अष्टावक्र ने राजा जनक को परमात्मा के रहस्य को समझा दिया था।

जब अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि प्रभु मैं कैसे परमात्मा को पाऊँ, मुझे इसके लिए निर्देश दें, उपदेश दें तो भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘हे अर्जुन जो व्यक्ति परमात्मा की प्राप्ति करना चाहता है वह ऐसे तत्ववेत्ता संत, ऐसे किसी सद्गुरु को ढूंढे, जिसने स्वयं परमात्मा को जान लिया है।’ भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में ही तत्क्षण विराट रूप दिखाकर परमात्मा का बोध करा दिया था।

इस जिज्ञासा के लिए मानव चाहे हिंदू है, मुसलमान है, ईसाई है या सिख है, वह मोक्ष के लिए प्रयत्न कर रहा है और इसके लिए ध्यान, साधना, योग, सद्गुरु के शरण में या उन्हें जो-जो उपाय बताये जाते हैं, हर मानव उन उपायों को करता है। हमारे धर्मग्रंथ भी यही कहते हैं कि यह जो हमारा जीवन है उसका उद्देश्य ही है मोक्ष की प्राप्ति करना। आजकल के व्यक्ति जो होते हैं, उसकी वृत्ति काम से होती है, वासना से होता है। इस आधुनिक युग के लोग पाँच विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को खराब नहीं मानते हैं परंतु पुरातन धर्म से संबंधित ऋषि-मुनियों ने इसे विकार कहा है, रोग कहा है। जब मानव सद्गुरु के शरण में जाकर ऐसे तत्व को जान लेता है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अंहकार से मुक्ति प्राप्त कर लेता है तो उस अवस्था को मोक्ष कहा जाता है तथा ऐसे मानव का पुनर्जन्म नहीं होता है। हमें देखने में लगता है कि हम धनी हैं, गरीब हैं, अच्छे हैं, बुरे हैं लेकिन धर्मग्रंथ यह कहता है कि जिसने भी जन्म लिया है वह दुखी है। महात्मा बुद्ध ने तो यहाँ तक कहा है कि जन्म ही दुःख है, इससे बड़ा और कोई दुःख नहीं है। भगवान् महावीर तथा सारे ऋषि-मुनियों ने भी ऐसा ही कहा है। वास्तव में मोक्ष का अर्थ है कि वह मन का गुलाम नहीं है, वासना का गुलाम नहीं है बल्कि मन उसका गुलाम हो गया है, काम उसका गुलाम हो गया है, क्रोध उसका गुलाम हो गया है।

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